बांसवाडा: पूरी हुई बरसों की आस, बुझ रही धरती की प्यास-जल-देवरों के रूप में पहचान बना रही हैं अभियान की जल संरचनाएं

मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान में वैसा ही सब हुआ जैसा सोचा और किया गया था। अब यह अभियान बरदान साबित हो रहा है। बरसात का दौर शुरू क्या हुआ, बरसों से असिंचित होने का अभिशाप भोग रही धरती की प्यास बुझनी शुरू हो गई है। यह न केवल इंसानों और मवेशियों की जिन्दगी के लिए बल्कि ग्रामीणों के अपनेे इलाकों के लिए सरकार का यह तोहफा है जिसका जयगान आने वाली पीढ़ियां करती रहेंगी।

मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे की दूरदर्शी सोच को इस अभियान से मूर्त रूप मिला है और इस पर ठप्पा लगा दिया है बारिश ने। प्रदेश पर इन्द्रदेव की कृपा बरसनी शुरू हो गई है और माहौल सुकून देने लगा है। प्रदेश के जनजाति क्षेत्रों में खेती-बाड़ी और पशुपालन से आजीविका चलाने वाले ग्रामीणों के लिए राज का यह काम उनकी जिन्दगी के खूबसूरत और यादगार कामों में शुमार हो चला है। जनजाति बहुल बांसवाड़ा जिले में बरसों से जल समस्या भुगत रहे, नहरी पानी और जलाशयों से वंचित असिंचित और पहाड़ी क्षेत्रों में इस अभियान ने कमाल कर दिखाया है। असिंचित क्षेत्रों के जलाशयों में बरसात के पानी को रोकने व गांव का पानी गांव में, खेत का पानी खेत में रोकने की मुहिम सफल हो रही है। बरसाती पानी को पहाड़ों से लेकर खेतों तक में जगह-जगह रोकने के लिए मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान के अन्तर्गत बनी जल संरचनाओं ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है।

जिन इलाकों में अब तक बरसात का दौर आरंभ हो चुका है वहाँ बरसते पानी को रेंगकर चलना पड़ रहा है और रेंगते हुए पानी को अपने-अपने इलाकों ठहरने के लिए विवश होना पड़ रहा है और ठहरा हुआ पानी अपना ठौर तलाशने के लिए जमीन के भीतर उतरने लगा है। मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे की अभिनव सोच और दूरदर्शी विकास को सुनहरा आकार देने के लिए संचालित मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के जनजाति क्षेत्र में आशातीत सफलता का परचम लहराने लगा है। इसे अभियान की करिश्माई आशातीत सफलता के रूप में देखा जा रहा है। इस ऎतिहासिक अभियान से पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग वो सुकून महसूस करेंगे जिसे कोई भुला नहीं पाएगा। बांसवाड़ा जिले के असिंचित क्षेत्रों में बने एमपीटी, सीसीटी, डीसीटी आदि जल संग्रहण कार्यों से छोटे-छोटे नाकों में बरसात का पानी भरने लगा है और जलस्तर में उत्तरोत्तर बढ़ोतरी होने लगी है। इससे इन क्षेत्रों में जलाश्य से भरे पानी से पशुधन व मवेशियों को भी लाभ मिलना शुरू हो गया है।

असिंचित क्षेत्रों के ग्रामीणों के चेहरों पर अबकि बार खास खुशी की चमक-दमक दिखाई दे रही है। इन ग्रामीणों ने बताया कि पहली व दूसरी बारिश में जल स्वावलम्बन के तहत किये गये जल संरक्षण के ढांचों में पानी का लगातार संग्रहण हो रहा है। इससे सिंचाई व पशुधन को सीधा लाभ मिल रहा है। पेयजल की दृष्टि से गांवों में काफी सुधार होने लगा है। मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन के तहत बने कूपों में भी पर्याप्त पानी की आवक जारी है। ग्रामीणों को पक्का विश्वास हो चला है कि उनके इलाकों के लिए इस बार की बारिश से न केवल जमीन तरबतर होगी बल्कि पहाड़ों पर भी जगह-जगह बने जल भण्डारों में पानी भरेगा और पहाड़ के पहाड़ अपने भीतर लम्बे समय तक सरसता और आर्द्रता संजोये रख सकेंगे। इससे हरियाली का मंजर पसरेगा और नमी की वजह से गर्मी के तेवर पर भी लगाम लग सकेगी। इनके साथ ही पहाड़ों के ढलानी क्षेत्रों और जल प्रवाह मार्गों पर बड़ी संख्या में निर्मित जल संरचनाओं में पानी का संग्रहण होगा और लम्बे समय तक पानी की उपलब्धता बनी रहेगी। इससे असिंचित क्षेत्र के ग्रामीणों को पेयजल के साथ सिंचाई सुविधाओं का भी लाभ मिलने लगेगा।

पानी की समस्या से अर्से तक जूझते रहे पहाड़ी एवं आदिवासी इलाकों के लोगों के लिए यह अभियान गांव-गांव खुशहाली लाने वाला सिद्ध हो रहा है। ग्रामीणों में इस बात की भी खुशी है कि उनकी मेहनत रंग लायी है और गांव पानी के लिहाज से आत्मनिर्भरता पाने लगे हैं। आदिवासी क्षेत्रों में ग्रामीणों के लिए ये आधुनिक जल देवरे बहुआयामी ग्राम्य विकास की बुनियाद के रूप में पहचान बनाने लगे हैं।

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जयपुर, 4 जुलाई 2016

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